Sunday, September 6, 2015

उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने अरावली अधिसूचना मई 1992 में अरावली पर्वत शृंखला के पर्यावरण के संरक्षण के लिए जारी की, जिस की अनुपालना करते हुए बर्ष 2005 में अलवर मास्टर प्लान बनाया गया और यह संवेदनशील क्षेत्र घोषित हुआ। राज्यपाल द्वारा जारी 26 अगस्त 2011 की अधिसूचना के मुताविक, अब अलवर जिला की सभी विकास परियोजनाओं को इस मास्टर प्लान में निर्धारित दिशानिर्देशों के अनुसार संचालित करना बाध्यकारी कर दिया गया।   
इसी दौरान DMRC की प्रस्तावित पर्यटन परियोजना के लिए हजारों हेक्टर भूमि इसी पर्वत शृंखला में इस्माइलपुर में चयनित की गई। दिल्ली मेट्रो रेल निगम की इस परियोजना के तहत त्वरित रेल ट्रांज़िट व्यवस्था (RRTS) के अंतर्गत दिल्ली पानीपत से अलवर मेरठ तक कॉरिडोर  बनाने की है। साथ ही चुपचाप DRDO के लिए अलवर के पास 850 हेक्टर वन भूमि का हस्तांतरण कर दिया गया। जिस में साथ लगती कई ग्राम पचायतों;जाजोर,किथुर, खोहबास, पहाड़ा, मेहरामपुर, घासोली इत्यादि के कई गावों की बर्तनदारी वन भूमि, स्थानीय वन निवासियों की मंजूरी व जानकारी के बिना हस्तांतरण कर दी गई। पाँच किलोमीटर चौडे व 12 किलोमीटर लंबे इस  पहाड़ पर 13 पंचायतों के चालीस से अधिक गावों की 65 हजार से भी अधिक आवादी के परंपरागत वन अधिकार हैं, जिन्हें नजरदाज़ किया गया।

यह वन भूमि किस उदेश्य के लिए DRDO को दी गई, इसका स्पष्ट जानकारी कहीं भी सरकारी तौर पर ग्रामीणों को उपलव्ध नहीं कारवाई गई। परंतु अखवारों से मालूम होता है कि रक्षा शोध एवं  विकास संगठन (DRDO) यहाँ पर मिसाइल लॉंच पैड बनाने जा रहा है। जबकि साथ में लगते पाली जिला में मिसाइल interseption base प्रस्तावित किया गया है। जिस के लिए दोनों जगह हजारों हेक्टर वन भूमि हस्तांतरित की जा चुकी है।
इन तीनों प्रस्तावित परियोजनाओं के लिए अति संवेदनशील अरावली पर्वत शृंखला की बलि दी जा रही है। हालत यह है कि किसी भी पर्यावरणीय कानूनों के प्रावधानों को सज्ञान में लिए बिना यह कार्य किया जा रहा है तथा स्थानीय लोगों के वन अधिकारों को नजरंदाज कर दिया है।
स्थानीय जनता से बात करने पर मालूम हुआ कि सरकार ने इस परियोजना के लिए वन हस्तांतरण की प्रक्रिया में कहीं भी पर्यावरणीय व वन मंजूरी तथा पर्यावरणीय प्रभाव आंकलन का हवाला नहीं दिया है। न ही कोई DPR (Detail Project Report), EIA (पर्यावरण प्रभाव आंकलन) व EMP के कागजात उपलब्ध है। पर्यावरणीय जनसुनवाई भी नहीं की गई। ऐसे में वन हस्तांतरण की प्रक्रिया को कैसे स्वीकृति दी गई, यह प्रश्न सब के सामने है। DRDO के लिए ऐसे कोई भी विशेष कानून तो है नहीं जिस के तहत सभी कानूनी प्रक्रियाएँ निरस्त की जा सकें। यह वन हस्तांतरण पहली नजर में ही गैर कानूनी लगता है। लोगों को पूछने पर मालूम हुआ कि  यह कोई मिसाल भंडारण की परियोजना है जो 16 हजार करोड़ रुपय से भी अधिक की परियोजना हो सकती है। ऐसे में इस की पर्यावरणीय व वन मंजूरी कानून बांछित है। पर्यावरणीय जन सुनवाई भी करनी होगी। इस से पहले DPR,EIA व EMP की रिपोर्ट की प्रति लोगों को स्थानीय भाषा में उपलब्ध करवानी होगी। स्थानीय लोगों के मुतविक इस मुद्दे पर ऐसी कोई भी प्रक्रिया नहीं अपनाई गई।
हस्तांतरित की गई उक्त भूमि वन भूमि है, ऐसे में कोई वन हस्तांतरण की प्रक्रिया तब तक नहीं चलाई जा सकती, जब तक वन अधिकार कानून 2006 के तहत स्थानीय लोगों (वन निवासियों) के परंपरागत वन अधिकारों के सत्यापन और मान्यता की कार्यवाही पूरी नहीं की जाती है। माननीय उच्चतम न्यायालय ने नियमगिरी के फैसले में भी इस की पुष्टि की है और स्पष्ट आदेश पारित किया है कि जब तक वन अधिकारों के मान्यता व सत्यापन की प्रक्रिया पूरी नहीं की जाती तब तक वन भूमि का इसी दूसरे गैर वानिकी कार्य के लिए हस्तांतरण नहीं हो सकता है। ऐसे में उक्त वन हस्तांतरण में कानूनी अवहेलना व न्यायालय के आदेशों का सरासर उलंघन हुआ है।
मेवात किसान पंचायत के नेतृत्व में वन भूमि की इस लूट के खिलाफ किसान पिछले कई दिनों से आंदोलन कर रहे हैं। 15 अगस्त को आंदोलन के नेतृत्व से प्रशासन की समझौता वार्ता भी हो चुकी है जो वेनतिजा रही। इस मुद्दे पर तीन सितम्बर को अलवर में किसान महा पंचायत की बैठक बुलाई गई थी, जिस में जिला के सभी राजनीतिक दलों व बर्तमान तथा भूतपूर्व जनप्रतिनिधियों को बुलाया गया था। बेहरहाल दो-तीन को छोड़ कर वाकि नेता लोग तो बैठक में नहीं पहुंचे, परंतु तकरिवन 30 ग्राम पंचायतों से पाँच सौ से अधिक स्थानीय लोग और पंचायत प्रतिनिधि जरूर बैठक में हाजिर थे।
मैं स्वयं इस बैठक में उपस्थित था। बैठक में मुझे मालूम हुआ कि उक्त हस्तांतरण के लिए वन विभाग ने 25 मई 2013 को ग्राम पंचायतों को वन अधिकार कानून 2006 के तहत अनापति प्रमाण पत्र देने का अनुरोध किया। बाद में अगस्त तथा सितम्बर 2013 में कुछ पंचायतों से अनापति प्रमाण पत्र विभाग ने हासिल कर लिए। परंतु पंचायतों का कहना है कि रेकॉर्ड के मुताविक किसी भी पंचायत ने ऐसे प्रमाण पत्र जारी नहीं किए हैं। इस बारे में जिला कैलेक्टर को शिकायत पत्र भी भेजा और झूठे प्रमाण पत्र जारी किए जाने की जांच के लिए लिखित मांग की है। ग्रामीण मांग कर रहे हैं कि पहाड़ का DRDO को हस्तांतरण गलत तरीके से हुआ है, इस लिए इस आवंटन को तुरंत रद्द किया जाए।
यह पूरा पहाड़ गौचर भूमि है, जिस में आज भी ग्रामीणों की चार हजार से भी अधिक गाय चरती है और भूत सी गायें जंगल में ही रहती हैं। बकरी व अन्य पालतू पशु भी इसी में चरते हैं। दूसरे क्षेत्रों के घुमंतू पशुचारी भी यहाँ मौसमी चरान करते हैं। इसी पहाड़ पर अनेकों मजार व सभी समुदायों के धार्मिक स्थल स्थित हैं। ग्रामीण इस पहाड़ के जंगल में उपलब्ध लघु वन उत्पाद तथा जड़ी-बुट्टी के लिए भी सदियो से निर्भर रहे हैं और अपनी आजीविका की जरूरतों को पूरा करते रहे हैं। जिस के दोहन का उन्हें परंपरागत अधिकार प्राप्त है। अरवली पर्वत शृंखला के ये पहाड़ जल संरक्षण के लिए अति महत्व पूर्ण हैं, जिस पर तराई में बसी लाखों की आवादी को पानी मिलता रहा है। लोगों व सरकार द्वारा पहाड़ पर जल संरक्षण के लिए सदियों से जोहड़ और तलाव बनाए गए हैं तथा अब के दौर में मनरेगा से भी सेंकड़ों जोहड़ व एनिकट आदि बनाए गए। चूंकि यह पहाड़ बोल्डर से बना है, इसलिए पहाड़ पर बने जलाशयों के कारण बहुत बड़े क्षेत्र में पानी रिचार्ज होता है।
इस आंदोलन के नेता विरेन्द्र विद्रोही का कहना है कि पहाड़ सिर्फ पत्थरों व चट्टानों का जखीरा नहीं होता, इसका अपना अर्थशास्त्र है, जिसे वे ही समझ सकते हैं जो पहाड़ के साये में जीवन जी रहे हैं। इसीलिए जल संरक्षण की सार्थकता को सज्ञान में लेते हुए, अरावली पर्वत शृंखला के संरक्षण की बात अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी उठ रही है।
इस पर्वत शृंखला की तलहटी में सदियो से मेव और अन्य समुदायों की लाखों की आवादी निवास करती है और अपनी आजीविका की जरूरतों के लिए परंपरा से इस पहाड़ की वन  भूमि पर निर्भर रही है। क्षेत्र के सभी ग्रामीण वन अधिकार कानून के तहत आदिवासी वन निवासी व अन्य परंपरागत वन निवासी की श्रेणी में आते हैं। ऐसे में यह वन हस्तांतरण गैर हुआ कानूनी है, जिसे तुरंत निरस्त किया जाना चाहिए और वन अधिकार कानून के प्रावधानों के मुताविक ग्रामीणों के परंपरागत वन अधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए।


गुमान सिंह
संयोजक- हिमालय नीति अभियान (guman107@yahoo.co.in)

मेवात की अरावली पर्वत शृंखला पर गहराता संकट

Wednesday, September 2, 2015

The incident of a 25-year-old man beaten to death by the family members of his girlfriend in Sriganganagar two days ago shocked many, but the murders over love affairs and illicit relationships seem to be a regular occurrence in the state. They were the motive behind as many as 50 of the total murder cases reported in Rajasthan in 2014, according to the National Crime Records Bureau (NCRB) figures released recently.

The latest case was related to 27-year-old woman Poonam’s murder in Jalore last month.

Everybody was surprised when the police arrested Chunni Devi – the mother of Poonam’s paramour – for the crime. Five-month pregnant Poonam was living with the family of her paramour Devendra Jangu as his widow. In May, her husband Prakash Bishnoi was arrested for murdering Devendra. Prakash and his armed men had abducted Poonam and Devendra from their rented house in New Bhupalpura area in Jalore.
photo +DNA 

While 41 people were killed over love affairs, nine were murdered over illicit relationships. The other prominent motives behind murders are personal vendetta, enmity and property disputes. As many as 89 murder cases were reported in the state over personal enmity. Property dispute was the motive behind 65 murder cases.

One of the most shocking cases of murders over property dispute and communal animosity was reported in Nagaur’s Dangawas area in May this year. Hundreds of Dalits from Nagaur district’s Dangawas and surrounding villages had fled for their lives after the region’s dominant upper caste, the Jats, allegedly mowed down Dalits under tractors, and grievously wounded many others following the flaring up of a decades’ old land dispute. The Jat violence followed firing by Dalits in which one dominant caste member was killed. Nearly six people were killed and over a dozen were injured in the violence.

A total of 1,637 murder cases took place in Rajasthan in 2014, claiming lives of 1,688 people.

“It’s true that most of the murder cases in Rajasthan are related to property disputes and personal enmity. The good thing is that not many cases occurred as organized crimes. Most of the murders were spur-of-the moment cases,” said a police officer.

The officer said that love affairs are still considered a taboo in rural and many urban areas in the state. “The society is yet to accept a relationship between two adults. In many cases, the family members protest because the couple are from same gotra or from different castes. In some cases, violence is caused where the love affairs are triangular. These are common phenomena across the country,” the officer added. 

NCRB : Love affairs, illicit relations claimed 50 lives in 2014 in Rajasthan alone

Sunday, July 26, 2015

On #yakubMemon


My personal take, ready for criticism as I know majority will oppose.
I am not claiming his innocence neither am I saying trust his claim that he is a changed man now & wants to serve India. Neither m I being insensitive towards the '93 blast victims & their families..

But yes I want to quote- "Don't hang #YakubMemon"

Death is - end to suffering....
Don't gift him death...
Instead punish him with Life...

Yakub being a well educated fellow,his skills can be used for good.I mean he should be ordered to teach & help prisoners in jail with their education for rest of his life in jail.

Hanging him is not the answer,it's an easy way out for him.
It's likely that his execution might make him a hero for some,victim for some & so on....
He is in jail since last 22+ years.. let him rot there....
Keeping him alive but in jail till his last breath, this would be a better punishment.

As quoted by our law intellects

Life sentence is like slow poison.( a five-judge Constitution bench hearing a case linked to former prime minister Rajiv Gandhi's assassins said)

Quoted by Chief Justice HL Dattu, who heads the bench,
"In the death sentence, one is dead and gone and people also forget about that person as public memory is short. But life sentence is like slow poison. We want them to be alive and suffer and realise the crime they committed and understand how the victim's family felt.
When we commute death to life it means life till death and no remission is permissible"

~ my personal take....
    Critics are welcome.

Don't gift him DEATH

Saturday, June 27, 2015

रूढि़वाद से अलग हटकर समाज में जीने की है तमन्ना

नक्सल प्रभावित गया जिला के बांकेबाजार प्रखण्ड के ठाढ़ी पहाड़ के तलहटी में बसा जमुआरा कला गांव के 70 वर्षीय भुनेश्वर विश्वकर्मा अपने जीवन काल में पांच काम पूरा करने संकल्प लिया है। इस के तहत उन्होंने स्मारक बनाकर सपत्नीक दो प्रस्तर की मूर्ति रख चुके हैं। उन्होंने बताया कि इस कार्य की कई ग्रामवासी और रिश्तेदार आलोचना भी करते है। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। हमने जो मन में ठाना है। धीरे- धीरे करने का प्रयास कर रहें हैं। उन्होंने कहा कि 6-7 साल पहले मन में पाच काम करने का विचार आया। जिसमें पाच आम का पेड़ लगाना, पोखर बनाना, छोटे बच्चों को भोजन करने की निशुल्क व्यवस्था, गरमी के दिनों में चार माह सार्वजनिक चैक चैराहों पर ठंढ़ा पानी पिलाना तथा अपने जीवन में अपना ही स्मारक बनाना है। यही नहीं कफन के पैसे भी सुरक्षित रहेगा। तीन काम कर चुके है। पोखर का निर्माण ठाढ़ी पहाड़ के नीचे हो चुका है जिसमें प्रतिदिन हजारों पशु अपनी प्यास बुझा रहें है। आम का पेड़ भी तैयार हो चुका है जो फल के साथ- साथ छाया दे रहा है। स्मारक भी बनकर तैयार है।
                              श्री विश्वकर्मा बताते हैं कि गांव के कुछ लोग हमें पागल के साथ न जाने क्या- क्या कहकर आलोचना करते है। हिन्दू धर्म के विपरीत स्मारक बनाने के काम को मानते हैं। कुछ पंडित भी इस कार्य को सही नहीं मानते है। लेकिन इस समबन्ध में उनके गुरु जो बंगाली ब्राह्मण के साथ बड़े कर्मकाण्डी भी है ने मार्गदर्शन करते हुए बताया कि लोगों को सारा दान या कार्य मरणोपरान्त नहीं अपने जीवन काल में ही कर लेना चाहिए। इसी के बाद उन्होंने दो उजले पत्थर की मुर्तियां बनवाकर लाया और उसे स्मारक बनाकर रखे हुए हैं।  वे बताते हैं कि वे पाखण्ड और पाखण्डियों से दूर रहना चाहते है। व्यवहारिक तौर पर जो अच्छा लगे उसे करना चाहते हैं। आम एवं नारियल के फल को स्वंय के उपयोग के बाद आम लोगों में वितरण कर देते हैं।

                 श्री विश्वकर्मा सिर्फ साक्षर हैं। कोलकाता में उनकी पारंपरिक फर्नीचर की दुकान है। जो उनके पुत्र द्वारा संचालित हैं। ये अब गांव पर रहकर खेती और बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन का काम देखते हैं लेकिन कोलकाता प्रायः आना जाना लगा रहता है। उन्हें अपने कारोबार का हुनर है और अपने काम को वे बखुबी निभाते हैं। फिलहाल वे दो छुटे हुए काम बाल-भोजन और ठंढ़ा पानी पिलाने के लिए प्रयासरत हैं। वे बताते हैं कि इस कार्य में बेटा - बहु, बेटी -दामाद और सारे परिवार का सहयोग है। तीन पुत्र और तीन पुत्रियों के साथ भरा पूरा परिवार एक ही क्षत के नीचे रहते हैं।  घर का एक भी परिवार विरोध नहीं करता है। पत्नी रामपति देवी ग्रामीण माहौल में रहकर भी हमें साथ दी है। जिसके कारण आलोचना करने वालों की भी मुॅह बंद सी हो गई है। इस प्रकार एक ओर लोग जहां मौत से डरते हैं। दाह संस्कार या मरणोपरान्त उपयोग में लाने वाली वस्तु को घर में रखना या लाना अशुभ मानते हैं वहीं श्री विश्वकर्मा अपने घर के दरबाजे पर स्मारक बनाकर मूर्ति रख चुके हैं। विश्वकर्मा का मानना है कि इस प्रकार की सोच अंधविष्वास का द्योतक है। उनका स्पष्ट मत है कि मनुष्य को सभी काम अपने जीवन काल में कर लेना चाहिए, मरनोपरान्त नहीं। इधर ग्रामीण रामप्रवेश विश्वकर्मा, विष्वनाथ प्रसाद यादव बताते हैं कि शुरूआती दौर में जब मूर्ति लेकर आए थे तो गांव के लोग कई प्रकार की बातें करते थे लेकिन अब धीरे- धीरे समान्य हो गया है। हालांकि धर्म के आड़ में आज भी कुछ आलोचना होती है। 

-- कौशलेन्द्र कुमार

 

जिंदगी में ही बनाया अपना एवं पत्नी का स्मारक

Monday, June 22, 2015

मुझे पानी चाहिए, मुझे पानी चाहिए , मुझे पानी चाहिए
अगर आपके घर में पानी है तो मुझे पिने के लिए पानी चाहिए |

लेकिन हालात बहुत नाजुक होंगे जब किसी के पास पिने लायक भी पानी नहीं होंगा कल मेवात के हर घर में पानी था कही नलकूप लगाओ हर जगह पानी था आज नहीं है उसके बाद मेवातियो के अरावली की पहाड़ी और दूसरी जगह से आ रहा पानी पिया वो भी अब नहीं रहा समय के अनुसार सब बदल रहा है और अब आप सब जानते है की मेवात में हर जगह पानी की किल्लत है एक समय था जब आप अपने गाँव के डेहर में मछली पकड़ने जाते थे जब आपके गाँव में कुआ था और सभी वहा नहाने जाते थे आज मेवात के कुआओ में भी पानी नहीं है तलब के हालात भी ठीक नहीं है आखिर क्यों क्या हमने कभी सोचा की ये क्या क्यों हो रहा है ऐसा
आज के हालात ये है की हमें पिने के पानी के लिए रेनिवाल पर निर्भर होना पड़ रहा है आज के समय में रेनिवाल को अगर मेवात की दूध की नहर माना जाये तो ठीक ही होगा क्योकि और कोई साधन नहीं है जिससे उम्मीद लगाई जा सके | हरयाणा सरकार और भारत सरकार से मेवात को बहुत सी उम्मीद भी है जैसे की मेवात में मेवात केनाल हो कोटला झील को अच्छे से कम से कम 1000 एकड़ में बनाया जाये ताकि मेवात के हर घर को पानी मिल सके और किसान की किसानी सही से हो सके कही ने खेती के लिए पानी ने कही पिने के लिए पानी कैसा है मेवात हमेशा दुःख की ज़िदगी जीता रहा है |
एक समय था 2005 का जब मेवात को 425 करोड़ का प्रोजेक्ट मिला जिससे पुरे मेवात को पानी दिया जाना चाहिए था ये प्रोजेक्ट पुरे जिले मेवात के लिए था जिसमे तावडू ,नुह ,झिरका,पुनहाना ,नगीना , पिनंग्वा भी था इस प्रोजेक्ट का फायेदा किस किस खंड में मिला ये आप सब जानते है और जहा जहा इसका पानी पहुचता है वहा भी पानी सही से सही समय पर नहीं पहुच रहा है आज के समय के हिसाब से देखा जाये तो ये प्रोजेक्ट पुरे मेवात में पूरा हो जाना चाहिए था लेकिन ने कही लाइन बिछी ने कही सही से पानी पहुंचा ये है रेनिवाल प्रोजेक्ट मेवात हालात आप सब जानते है |
संघठन इस एरिया में क्या क्या कर रहे है |

रेडियो मेवात 1 सितम्बर 2010 से अपने प्रोग्राम खेत खलियान की बात के माध्यम से किसान भाईओ और सभी श्रोताओ को जागरूक कर रहा है इसके लिए समय समय पर गाँव में जाकर वर्कशॉपो का आयोजन भी किया जा रहा है और बहुत से कार्यक्रम के माध्यम से समुदाय को जागरूक किया जा रहा है जिसके बारे में मेवात के लगभग सभी लोग जानते है रेडियो मेवात के बारे में अक्सर गाँव वासी करते है की ये जानकारी का एक अच्छा साधन है जो हमेशा चलते रहना चाहिए समय समय पर अलग अलग विभागों के बारे में जानकारी देते रहते है कहने का मतलब ये है की ऐसा कोई विभाग नहीं है जिसके बारे में रेडियो मेवात की टीम अपने प्रोग्राम के माध्यम से न बताती हो हर विभाग के बारे में किसी ने किसी प्रोग्राम में जानकारी डी जाती है रेडियो मेवात की डायरेक्टर अर्चना कपूर ये चहाती है की मेवात के हर नागरिक को सशक्त करना है सभी विभागों की जानकारी हर आदमी के पास जानी चाहिए और पूर्ण जानकारी रेडियो पर दी जानी चाहिए सभी के अधिकारों के बारे में हमें बताना है यही हमारा उदेश्य है |
ऊर्जा एवं संसाधन संस्थान (टेरी) एवं जल संसाधन मंत्रालय द्वारा इंडिया हैबिटैट सेन्टर, दिल्ली में आयोजित भारतीय जल गोष्ठी के उद्घाटन भाषण में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने कहा था की 'बढ़ती जनसंख्या और जलवायु परिवर्तन के चलते जल-प्रबंधन के क्षेत्र में नई चुनौतियां सामने हैं, जिनका मुकाबला प्राथमिकता के आधार पर होना चाहिए, इन स्थितियों को देखते हुए आज हमें जल संसाधनों में व्यापक सुधार की जरुरत है।' ओट्टावा में कनेडियन वाटर नेटवर्क (सीडब्लूएन) द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय बैठक में वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि ग्लोबल वार्मिंग और बढ़ती जनसंख्या के कारण आगामी 20 सालों में पानी की मांग उपलब्धता 40 प्रतिशत ज्यादा होगी । मतलब यह कि 10 में से 4 ही लोगों के लिए पानी होगा। अगले दो दशकों में दुनिया की एक तिहाई आबादी को अपनी मूल जरूरतों को पूरा करने के लिए भी जरूरी जल का सिर्फ आधा हिस्सा ही मिल पाएगा। सबसे ज्यादा आफत तो कृषि क्षेत्र पर आएगी, जिस पर कुल आपूर्ति का 71 फीसदी जल खर्च होता है, इससे दुनियाभर के खाद्य उत्पादन पर जबरदस्त असर पडग़ा ।
वैसे तो पानी की समस्या सारे विश्व के सामने है लेकिन हमारे देश में यह कुछ ज्यादा ही विकट है। तिब्बत के पठारों पर मौजूद हिमालयी ग्लेशियर सारे एशिया के करीब 1.5 अरब से अधिक लोगों को मीठा जल मुहैया कराते हैं । इनसे भारत, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल की नौ नदियों में पानी की आपूर्ति होती है, जिनमें गंगा और ब्राह्मपुत्र भी शामिल हैं । लेकिन जलवायु परिवर्तन व ब्लैक कार्बन जैसे प्रदूषक तत्वों ने हिमालय के कई ग्लेशियरों से बर्फ की मात्रा घटा दी है । माना जा रहा है कि इनमें से कुछ तो इस सदी के अंत ही तक खत्म हो जाएंगे। इन तेजी से पिघलते ग्लेशियरों से समुद्र का जलस्तर भी बढ़ जाएगा जिससे तटीय इलाकों के डूबने का खतरा भी है ।
      अब एक नजर इस सिक्के के दूसरे पहलू पर भी डाल लेते हैं |

 बिना इस सच्चाई से मुहं मोड़े कि पानी के बिना इस दुनिया की कल्पना करना भी नामुकिन है , कुछ अहम सवाल है जिनके जवाब जानने बाकी हैं, जैसे कि हमारे वैज्ञानिक लगातार कह रहे हैं कि हिमालयी ग्लेशियर पिघल रहे हैं। अगर ये ग्लेशियर पिघल रहे हैं तो नदियों और नहरों का जल स्तर क्यों नहीं बढ़ रहा ? कहा जाता है कि कुल स्वच्छ पानी का सत्तर प्रतिशत खेती के काम आता है । सवाल है कि देश में खेती योग्य जमीन लगातार घट रही है, वहां जो पानी लगता था वह कहां गया ? मान लिया कि उस अनुपात में आबादी बढ़ गई, पर क्या आबादी खेती जितना पानी इस्तेमाल कर सकती है ?  हरित क्रांति के बाद दुनिया भर के वैज्ञानिक लगातार ऐसे बीज तैयार करने में जुटे हैं जो कम समय और कम पानी में ज्यादा फसल दे सकें। उनका यह प्रयास बहुत हद तक कामयाब भी रहा है, जिसका एक प्रमाण गेहूं के नए बीज हैं जो 90 से 100 दिन और मात्र दो ही पानी में पक जाते हैं।
एक और सच्चाई यह भी कि पृथ्वी का पानी किसी भी सूरत में यहां से बाहर नहीं जा सकता। हमारा 97 प्रतिशत पानी जो पीने योग्य नहीं है, लेकिन कमाल की बात ये है की जब ये पानी गर्मी के कारन असमान में चला जाता है तो बाद में ये पानी बरसात के कारन वापिस जमीन पर आता है तो ये तुरंत ही रूप धारण करके मीठा पानी का रूप धारण कर लेता है लेकिन समुन्द्र का पानी खारी होता है इसी लिए कहा जाता है की समुन्द्र का पानी पिने के योग्य नहीं होगा है | पानी का सबसे बड़ा हिस्सा समुन्द्र हैं । इसी समुन्द्र से गर्मी की वजह से बरसात होती है। बरसात से खेती सदियों से होती आ रही है और हमारी जमीन भी दुबारा पानी से भर जाती है, जिससे कुओं में पानी आता है। हमारी बरसाती नदियां, तलाब, बावडियां, पोखर सब बरसात से ही भरते हैं।
पहाड़ी क्षेत्रों में बरसात, ठडें मौसम में बर्फ की सूरत बरसती है, जिससे ग्लेशियर बनते हैं और जिसके पिघलने से साल भर नदियां बहती हैं, नहरें चलती हैं। यानी अगर हम बरसात को सहेजना सीख जाएं तो पानी की समस्या सदा के लिए खत्म हो सकती है। इन तथ्यों पर विचार करने के बाद एक बड़ी अहम शंका उठती है कि- क्या ये वैज्ञानिक दावे झूठे हैं ? यह कैसे संभव है कि दुनिया भर के वैज्ञानिक और पानी की चिन्ता करने वाले एक साथ झूठ बोल रहे हैं ? इसकी एक वजह तो यह समझ आती है कि दुनिया के सभी देशों में पर्याप्त मात्रा में बरसात नहीं होती, इस वजह से वहां का जलस्तर भी काफी गहरा होता है हाल ही में कृषि विभाग के वैज्ञानिक ने बताया की हर साल 3-4 फूट निचे जल सतर निचे जाता है कई कई जिलो के खंडो को डार्क जोन घोषित सरकार के माध्यम से किया जा चूका है लेकिन जहा पानी की भारी समस्या हो वहा क्या किया जाये क्या उसे डार्क जोन नहीं कहा जा सकता है सरकार कभी कभी इस मामले में चुक कर जाती है जिसके पीछे कई बड़े कारन होते है वहा कोई ऐसा प्लांट लगाना हो जो वाटर लेवल को कम कर सके मेवात जैसे एरिया में भी ऐसा ही किया जा रहा है । उन देशों के बारे में दिए गए बयानों को हमने भी अपने लिए मान लिया । इसका यह अर्थ न लिया जाए कि हमारे यहां पानी की किल्लत नहीं है । देश का एक बड़ा क्षेत्र केवल बरसात और कुओं पर ही निर्भर है । जहां पानी है वहां भी सौ तरह के झंझट हैं । उदाहरण के लिए हम बात करते हैं पंजाब, हरियाणा और उत्तरी राजस्थान के उस हिस्से की जो विगत सत्तर-अस्सी सालों से नहरों पर ही निर्भर है । इस क्षेत्र में पानी की तथा-कथित कमी के कारण हैं- इन राज्यों के राजनैतिक झगड़े, भ्रष्टाचार, नहरों की जर्जर हालत और सिंचाई क्षेत्र में वृद्धि ।
ऐसे में, घोषित राष्ट्रीय जल अभियान की सफलता की उम्मीद करना बेमानी है। यह तभी संभव है जब हर व्यक्ति पानी का महत्व समझे । इस दिशा में कार्यरत मंत्रालयों और विभागों को एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराने के बजाय समन्वित तरीके से समस्या के समाधान के लिए प्रयास करना चाहिए । यदि हम कुछ संसाधनों को और विकसित करने में कामयाब हो जाएं तो काफी मात्रा में पानी की बचत हो सकती है।
उदाहरण के लिए यदि औद्योगिक संयंत्रों में अतिरिक्त सावधानी से करीब बीस से पच्चीस प्रतिशत तक पानी की बर्बादी रोकी जा सकती है। बहुत से देशों में इन कारखानों से निकलने वाले गंदे पानी को शोधित कर खेती में इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन दुर्भाग्य से हमारे देश में औद्योगिक क्षेत्रों में ही सबसे ज्यादा पानी की बर्बादी होती है। दूसरा वर्षा जल को सहेजने और पुन: भूमि में प्रविष्ट करवाने के लिए घरों, खासतौर पर बड़े-बड़े भवनों और स्कूलों आदि में जल-संग्रहण (वाटर हार्वेस्टिंग) व्यवस्था अनिवार्य हो तो यह जल की बचत में एक अहम कदम होगा । हालांकि इस बारें में कानून है कि सौ वर्गमीटर से बड़े सभी भवनों में जल-संग्रहण प्रणाली लगाना जरूरी है, लेकिन सरकार के जो विभाग इस कानून की पालना के जिम्मेदार हैं, खुद उनके अपने बड़े-बड़े भवनों में यह प्रणाली नदारद है। सार यह है कि बरसात और औद्योगिक इस्तेमाल के पानी को सावधानी से सम्भाल लिया जाए तो कम से कम तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिए तो नहीं लड़ा जाएगा ।
समय समय पर पानी को लेकर बैठके सरकारी विभागों की और एन जी ओ की होती रहती है जो जल संरक्षण के लिए काफी महवपूर्ण है जिसमे बारे में गाँव गाँव शहर शहर जाकर मीटिंग होती है लेकिन परिणाम “धाक के तीन पात” आखिर कारन क्या ?


आलेख 

-- मो आरिफ टाई,
सहायक प्रबंधक रेडियो मेवात 
media.arif1984@gmail.com 

पानी और तीसरा युद्ध ?

Saturday, June 20, 2015

An apprehension is mounting among the people of north-eastern region that the mainstream media is ignoring the flight of its people and has been working like a PR agency of the government to justify the imposition of AFSPA. Recently, it has been observed that the media was flooded with chest-thumping news and views on cross border operation on NE militants in Myanmar. All of sudden one IPS officer is being marketed as ‘face that militants fear’ even with factual errors. However, at the same time a huge portion of Assam and Arunachal Pradesh was witnessing devastating flood. No media was running ‘hastag’ race for the flood victims of Assam and Arunachal Pradesh.
As per the official release of Assam State Disaster Management Authority dated 13th June 2015, more than six hundred villages were submersed and over three lakh people affected in the recent flood. Though officially not reported, at least three persons have died so far in this devastating flood. This is harvesting season in Assam and the flood has destroyed a huge area of ready to harvest corps, the official figure is 11041.53 hectors.
I was getting disturbing updates from my home district Barpeta since 11th of June, 2015. Subsequently, I communicated with the district administration and got a quit relaxing response “we are monitoring the development and ready to act if any necessity arises” The concerned Circle Officer categorically informed me that the flood situation is still manageable and no need of taking rescue and relief operations. However, I was still getting SOS calls from my native district and finally decided to visit the area next day morning to have stock of the situation. While travelling from Guwahati to Barpeta, as I entered Nalbari district, I could easily see the devastation in the nearby agri-fields. The farmers has abandoned ready to harvest rice cultivation due to flood water. They have occupied half of the road for drying up the partially damaged harvested crops.
Situation in Barpeta district is more depressing; officially it is worst affected district in recent flood. Innas Ali, a marginal farmer who cultivated high yielding rice on his one hector agri-land and invested nearly sixty thousand rupees has been able to harvest only half of his total cultivation. Ali says that one fourth of the harvested crops have been damaged as it germinated due to heavy rain. Since last two/three decades, the peasants have started cultivating high yielding variety of rice replacing traditional one. They have been irrigating their paddy fields by diesel run power-pump machine incurring higher cost comparing to government provided irrigation facility. In lower Assam, irrigation facility is mostly managed by the farmers, which forces them to incur more costs and forces them to knock the door of money lenders for credit to meet the costs. A study conducted by Gorky Chakravarty of Institute of Development Studies, Kolkata revealed that nearly 67% of his respondents in Mandia, Chenga and Ruposhi block of Barpeta district are indebted and only 2.43% of them got credit from organized financial institutions. A huge chunk of people who get their credit from moneylenders often agree to repay crops instead of money. His study says that those ill-fated people are forced to pay an annual rate of interest ranging from 72% to 360%. In such a situation, any one can imagine how this flood is going to affect the lives of people like Innas Ali. 

Assam Flood: Who Cares? : Abdul Kalam Azad

Wednesday, April 8, 2015

In contemporary times, trafficking of women for commercial sexual exploitation has emerged as one of the crucial issues of global concern. The Indian subcontinent, which is intrinsically connected to the dreadful world of trafficking, is witnessing an indigenous process of trafficking network in the country where women viewed as ‘prospective brides’ are trafficked within and across its borders in the name of ‘marriage’ which actually ends up in sexual slavery and bonded labor for them, not just a single time but as many times as they are re-trafficked as brides. Trafficking today is dealt by different mechanism by the law enforcing body, but in spite of heightened effort, trafficking shows no sign of abating….The question here arises is why???


The answer of the question lies in the question itself. In the cases of bride trafficking a different subtle  modus operandi is adopted which is quite suitable according to the social norm of the society where it is taking place (destination states like Haryana , Punjab and some of the places in western UP).
If we are to fight bride trafficking we need a comprehensive and coordinated approach, globally and locally.  We need a response that creates partnerships to support criminal justice, victim assistance and protection, human rights, migration policy and labour market regulation".
Before preventing it when the crime took place, the correction of root problems lies in the society where we need to apply gender based approach to the issue of human trafficking done under the guise of marriage. A gender based analysis is required to understand the interplay of different forces from social, economic, political, at micro and macro level which make women more vulnerable to being trafficked than men. The other factors such as unequal economic development, mass unemployment, poverty, inequality, discrimination, gender based violence, patriarchal structure of the society are the primary root causes of bride trafficking where the solution lies.
To break all these chain of factors, we need to raise our voice to spread a social awareness amongst the people who need support of all socially responsible people. This patriarchal control over women’s education, employment and various choices need to be challenged. These social norm where crime is not taken as crime is inevitably serious to think upon. Imagine, where female feticide, infanticide, bride trafficking is taken as norm what  must be the thought process of people suffering with. These are intrinsically related factor which is making a fertile ground for sexual  and labour exploitation  of women under the guise of marriage. The veil of marriage where these people are protecting themselves need to be checked. The Victorian principle of free sex(without consent) in the realm of marriage where women has no say must be challenged. We need to criminalize the purchase of women as a commodity who are procured by different names. Concrete criminal justice mechanism is required which includes active participation of all the stakeholders from common man to panchayat, gram sabhas, police, ngos. Self help groups, socially active people, lawyers, judges etc. These problem can never be solved till the time we join our hand and rise against all illogical irrational and incorrect acts going  on around us. The social biasness, the gender discrimination must be challenged, if not that could lead to a social catastrophe with  very ugly consequences. So there is urgent need of participation to raise and stand together against this organized social menace called bride trafficking.          
                
KHUSHBOO ANAND (+khushi anandt) is  PHD RESEARCH SCHOLAR FACULTY OF LAW UNIVERSITY OF DELHI

she wants you to fight against Bride trafficking 
join www.empowerpeople.in 

A gender based analysis is required

What is the purpose of celebrating the victory of independence, when our sisters are  just seen as an item to study the concept of supply and demand. Why are we taught that life is not a monetary product, when on the other hand a daughter is born with a price tag over her. Where is the morality of wise men of India. Where is the philanthropy of saints? 

Bride trafficking presents hypocrisy in front of the era, because you link an alluring institution of our society that is marriage to the barbarous trade. This monstrous business of dumping women into hell occurs between those who auction them, to the ultimate buyers and the story is yet not over, they are also being used as a pleasure giving object by several inter-mediators. Rajasthan, Haryana and Punjab are among those who are contributing for the disappointing state of present.  What is the need of giving a woman a title of ‘jagat janani’ when you do not even bother to mean it, if you would have then you would not have called her by the derogatory and absurd names like ‘paro’ and ‘molki’.

We come on roads, we scream, we abuse and turn down the system if any one of our rights gets violated. Then why are we or prefer to keep our lips shut when it comes for raising our voice for someone whose every fundamental rights are denied from her? Where is the potential youth and administration of the highest democratic, plural cultured and sovereign country? A trafficked bride is compelled to work in farms as bonded labors, used by her husband’s relatives to satisfy their wild expectations and the most frustrating part is that they are hardly given the identity of being called as an Indian because their names are nowhere enrolled in the ration cards and voter ID cards. And we still talk of individual’s liberty in the preamble? Why? Why our Indian constitution is running out of laws for securing their rights to enjoy their existence as a self-rule individual who has no price tag, who is not a machine to produce children, who is equally important in making decisions for her entire family if not for the family then at least for her own self.

Time has come to slap those who see us as a mutilated sex. It is not just the fight of those who have survived in this trade but the duty of all of us to stand together and face the problem with a solution.   




@+Deepmala Tiwari is studying in Tata institute of Social Sciences. she tweets at  @DeepmalaTiwari
She also want you to fight against Bride trafficking join www.empowerpeople.in

AM I COMMODITY TO BE BROUGHT AND SHARED?